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Patna High Court: सामूहिक आपराधिक मंशा व्यक्तिगत भागीदारी के सबूत का विकल्प नहीं, दोषसिद्धि रद्द

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | पटना हाईकोर्ट ने कहा कि सामूहिक आपराधिक मंशा व्यक्तिगत भागीदारी के विश्वसनीय साक्ष्य का विकल्प नहीं हो सकती। बस गोलीबारी मामले में दोषसिद्धि रद्द कर अभियुक्त को बरी किया।

पटना, 2 अक्टूबर: पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी अभियुक्त को केवल इस आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि उसने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर अपराध करने की सामूहिक मंशा साझा की थी। अदालत ने कहा कि दोषसिद्धि के लिए अभियुक्त की व्यक्तिगत भागीदारी से जुड़ा विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य जरूरी है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बस में गोलीबारी के एक मामले में रंजीत महतो की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उन्हें बरी कर दिया।

मामले की सुनवाई जस्टिस संजय कुमार सिंह और जस्टिस अंसुल की खंडपीठ ने की। घटना में बस के भीतर गोलीबारी हुई थी, जिसमें दो लोगों की मौत हुई थी और अन्य यात्री घायल हुए थे।

प्रत्यक्षदर्शी के बयान पर उठे गंभीर सवाल

अभियोजन का मामला मुख्य रूप से सूचक अरुणा देवी के बयान पर टिका था। उन्होंने खुद को घटना की प्रत्यक्षदर्शी बताते हुए गोली चलाने वाले लोगों में अभियुक्त की पहचान करने की बात कही थी।

हालांकि, अदालत ने उनके बयान की बारीकी से जांच करते हुए बस में उनकी मौजूदगी और हमलावरों को पहचान पाने की परिस्थितियों को लेकर महत्वपूर्ण असंगतियां पाईं। कोर्ट के सामने यह सवाल भी महत्वपूर्ण रहा कि घटना के दौरान उन्हें आरोपियों को स्पष्ट रूप से देखने और बाद में उनकी पहचान करने का पर्याप्त अवसर मिला था या नहीं।

घायल गवाहों ने नहीं की अभियुक्त की पहचान

मामले में मौजूद दो घायल प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही भी अभियोजन के लिए अपेक्षित पुष्टि नहीं कर सकी। दोनों में से किसी ने रंजीत महतो की पहचान गोली चलाने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं की।

एक घायल गवाह ने तो स्पष्ट रूप से अदालत में कहा कि गोली चलाने वाले व्यक्ति वे नहीं थे, जिन्हें अभियुक्त के तौर पर कोर्ट के सामने पेश किया गया था।

अदालत ने इस तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना कि स्वतंत्र गवाहों की गवाही से अभियोजन की कहानी को वह आवश्यक समर्थन नहीं मिला, जिससे अभियुक्त की भूमिका को संदेह से परे स्थापित किया जा सके।

धारा 34 को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी

फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के इस्तेमाल से जुड़ा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामूहिक आपराधिक मंशा का सिद्धांत व्यक्तिगत अपराध में भागीदारी के विश्वसनीय प्रमाण की जगह नहीं ले सकता।

अर्थात, केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि सभी आरोपी एक समान आपराधिक उद्देश्य से जुड़े थे। अभियोजन को संबंधित अभियुक्त की अपराध में भूमिका को विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से स्थापित करना होगा।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 34 का इस्तेमाल अभियोजन के मामले में मौजूद महत्वपूर्ण कमियों को भरने के लिए नहीं किया जा सकता।

जांच में भी सामने आईं कई कमियां

हाईकोर्ट ने मामले की जांच के दौरान सामने आई कमियों पर भी गौर किया। हत्या में इस्तेमाल किए गए हथियार की बरामदगी नहीं हुई थी। इसके अलावा आरोपियों की पहचान के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड भी नहीं कराई गई थी।

मामले में पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक के सामने मृतकों में से एक की पहचान स्थापित किए जाने को लेकर भी कमी सामने आई।

अदालत ने हालांकि यह नहीं माना कि जांच में कमी होना अपने आप में किसी अभियुक्त को बरी करने का आधार बन जाता है। लेकिन जब जांच की खामियां अभियोजन की कहानी की महत्वपूर्ण कड़ियों को जोड़ने में बाधा बनती हैं, तब उनका प्रभाव मामले के अंतिम मूल्यांकन पर पड़ता है।

स्वतंत्र पुष्टि के बिना पहचान को सुरक्षित आधार नहीं माना

सभी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि मुख्य प्रत्यक्षदर्शी का बयान ऐसी स्थिति में नहीं था, जिसके आधार पर अकेले सुरक्षित रूप से दोषसिद्धि कायम रखी जा सके।

खास तौर पर अभियुक्त की पहचान के महत्वपूर्ण सवाल पर स्वतंत्र साक्ष्य से पर्याप्त पुष्टि नहीं मिलने के कारण अदालत ने अभियोजन के मामले को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं माना।

दोषसिद्धि और सजा निरस्त

इन परिस्थितियों को देखते हुए पटना हाईकोर्ट ने रंजीत महतो की दोषसिद्धि और सजा को निरस्त कर दिया तथा उन्हें मामले में बरी कर दिया।

फैसले में अदालत की टिप्पणी का केंद्रीय बिंदु यही रहा कि सामूहिक आपराधिक मंशा का सिद्धांत तभी लागू हो सकता है, जब अभियोजन विश्वसनीय साक्ष्यों से संबंधित अभियुक्त की अपराध में भागीदारी स्थापित करे। केवल धारा 34 का सहारा लेकर साक्ष्य की कमी पूरी नहीं की जा सकती।

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संपादकीय

कानून में सामूहिक जिम्मेदारी और व्यक्तिगत भूमिका के बीच संतुलन जरूरी

आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी व्यक्ति को सजा देने के लिए केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते। अदालत के सामने उपलब्ध साक्ष्यों से उसकी भूमिका स्थापित होना आवश्यक है। सामूहिक आपराधिक मंशा का सिद्धांत गंभीर अपराधों में महत्वपूर्ण कानूनी भूमिका निभाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि व्यक्तिगत भूमिका से जुड़े प्रमाण की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए।

पटना हाईकोर्ट के इस फैसले में प्रत्यक्षदर्शी की विश्वसनीयता, स्वतंत्र पुष्टि और जांच की कमियों जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया गया। यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि अभियोजन को आरोपों को साक्ष्यों की मजबूत कड़ियों से जोड़ना होता है। जहां महत्वपूर्ण कड़ियां कमजोर हों, वहां अदालत को उपलब्ध पूरे रिकॉर्ड का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना पड़ता है।

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